
लखनऊ, 31 जुलाई। विश्व फेफड़ों का कैंसर दिवस (1 अगस्त) से पहले किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग ने फेफड़ों के कैंसर को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) वेद प्रकाश ने कहा कि फेफड़ों का कैंसर आज दुनिया में कैंसर से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण बन चुका है। यदि समय रहते इसकी पहचान हो जाए तो मरीज की जान बचाई जा सकती है, लेकिन लक्षणों को नजरअंदाज करना जानलेवा साबित हो सकता है।
प्रो. वेद प्रकाश ने लोगों से अपील करते हुए कहा, “जागरूकता का दीप जलाएँ, फेफड़ों के कैंसर को हराएँ। धुआँ नहीं, उम्मीद जगाएँ। सांसों का सम्मान करें और समय पर जांच को जीवन का वरदान बनाएं।”
उन्होंने बताया कि वर्ष 2020 में दुनिया भर में फेफड़ों के कैंसर के 22 लाख से अधिक नए मामले सामने आए, जबकि करीब 18 लाख लोगों की मौत इस बीमारी से हुई। भारत में भी हर साल लगभग 67 हजार नए मरीज सामने आते हैं और पुरुषों में कैंसर से होने वाली मौतों का यह सबसे बड़ा कारण है।
KGMU के विशेषज्ञों के अनुसार धूम्रपान लगभग 85 प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार है। हालांकि जो लोग धूम्रपान नहीं करते, उनमें भी वायु प्रदूषण, सेकेंडहैंड स्मोक, रेडॉन गैस, एस्बेस्टस, औद्योगिक रसायनों, टीबी, COPD और आनुवंशिक कारणों से फेफड़ों का कैंसर हो सकता है। इसलिए केवल धूम्रपान न करना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि प्रदूषण और अन्य जोखिमों से बचाव भी जरूरी है।
विशेषज्ञों ने बताया कि लगातार खांसी, खांसी में खून आना, सांस फूलना, सीने में दर्द, आवाज बैठना, बिना कारण वजन घटना, भूख कम लगना, बार-बार फेफड़ों का संक्रमण, चेहरे या गर्दन में सूजन और लगातार थकान जैसे लक्षण फेफड़ों के कैंसर का संकेत हो सकते हैं। ऐसे लक्षण दिखने पर बिना देर किए विशेषज्ञ चिकित्सक से जांच करानी चाहिए।
प्रो. वेद प्रकाश ने कहा कि यदि बीमारी का पता शुरुआती चरण में चल जाए तो मरीज के पांच वर्ष तक जीवित रहने की संभावना करीब 59 प्रतिशत तक रहती है, जबकि कैंसर शरीर के अन्य अंगों में फैलने के बाद यह संभावना घटकर करीब 6 प्रतिशत रह जाती है। हाई-रिस्क लोगों में लो-डोज CT स्कैन के जरिए समय पर स्क्रीनिंग करने से मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
KGMU का पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग फेफड़ों के कैंसर की जांच और इलाज के लिए अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है। यहां ब्रोंकोस्कोपी, EBUS, थोराकोस्कोपी, PET-CT, CT स्कैन, मॉलिक्यूलर टेस्टिंग, लिक्विड बायोप्सी, रिजिड ब्रोंकोस्कोपी और क्रायो-बायोप्सी जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। मरीजों को सर्जरी, रेडिएशन थेरेपी, कीमोथेरेपी, टारगेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी जैसी नवीनतम उपचार सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं।
विशेषज्ञों ने लोगों से धूम्रपान पूरी तरह छोड़ने, सेकेंडहैंड स्मोक से बचने, स्वच्छ वातावरण अपनाने, पौष्टिक भोजन लेने, नियमित व्यायाम करने और जोखिम वाले व्यक्तियों की समय-समय पर जांच कराने की अपील की। उनका कहना है कि जागरूकता, समय पर जांच और आधुनिक इलाज ही फेफड़ों के कैंसर के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार हैं।
विश्व फेफड़ों का कैंसर दिवस की शुरुआत वर्ष 2012 में FIRS और IASLC के संयुक्त प्रयास से हुई थी। आज यह दुनिया भर में लोगों को जागरूक करने, शुरुआती जांच को बढ़ावा देने और बेहतर उपचार तक पहुंच सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण अभियान बन चुका है।
इस अवसर पर पद्मश्री प्रो. राजेंद्र प्रसाद, प्रो. यू.एस. पाल, प्रो. शैलेंद्र यादव, डॉ. शिव राजन, डॉ. सचिन कुमार, डॉ. मोहम्मद आरिफ, डॉ. अनुराग त्रिपाठी, डॉ. ऋचा त्यागी, डॉ. यश जगधारी, डॉ. दीपक शर्मा, डॉ. शुभ्रा श्रीवास्तव, डॉ. संदीप, डॉ. अपर्णा सहित विभाग के कई वरिष्ठ चिकित्सक और विशेषज्ञ उपस्थित रहे।






