September 24, 2026
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‘सेप्सिस में निवेश करें–जानें बचाएं’ थीम के साथ दो दिवसीय ‘सेप्सिस अपडेट 2026’ का आयोजन

लखनऊ। सेप्सिस जैसी जानलेवा बीमारी के खिलाफ जागरूकता और बेहतर उपचार व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग में देश-विदेश के विशेषज्ञों का महामंथन शुरू हुआ। विश्व सेप्सिस दिवस के अवसर पर 12 और 13 सितंबर को आयोजित दो दिवसीय ‘सेप्सिस अपडेट 2026’ कॉन्फ्रेंस में सेप्सिस की शीघ्र पहचान, आधुनिक उपचार पद्धतियों और बढ़ते एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस पर गहन चर्चा की जा रही है।

इस वर्ष विश्व सेप्सिस दिवस की थीम “सेप्सिस में निवेश करें–जानें बचाएं” (Invest in Sepsis–Save Lives) है। कार्यक्रम का फोकस सेप्सिस की रोकथाम, समय रहते पहचान, बेहतर उपचार, स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण तथा रिसर्च और इनोवेशन को बढ़ावा देने पर है।

एंटीबायोटिक के गलत इस्तेमाल पर सख्ती की जरूरत

उद्घाटन समारोह में उत्तर प्रदेश के चिकित्सा स्वास्थ्य, परिवार कल्याण एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव डॉ. अमित कुमार घोष मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि सेप्सिस के मामले में हर मिनट मायने रखता है। समय पर बीमारी की पहचान और उचित उपचार से गंभीर मरीजों की जान बचाई जा सकती है।

डॉ. घोष ने एंटीबायोटिक्स के अनावश्यक और गलत इस्तेमाल को गंभीर चुनौती बताते हुए कहा कि दवा-प्रतिरोधी संक्रमण तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में एंटीबायोटिक्स के विवेकपूर्ण इस्तेमाल के लिए राज्य स्तर पर एक प्रभावी नीति तैयार करने की दिशा में काम किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि बिना चिकित्सकीय सलाह के एंटीबायोटिक लेने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना जरूरी है, क्योंकि इसका सीधा संबंध ड्रग-रेसिस्टेंट संक्रमणों के बढ़ते खतरे से है।

‘सही एंटीबायोटिक, सही डोज और सही समय’ जरूरी

KGMU के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभागाध्यक्ष एवं आयोजन सचिव प्रो. डॉ. वेद प्रकाश ने कहा कि सेप्सिस एक गंभीर और जीवन-घातक स्थिति है। संक्रमण के प्रति शरीर की अनियंत्रित प्रतिक्रिया कई महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित कर सकती है।

उन्होंने कहा कि सेप्सिस के उपचार में सही एंटीबायोटिक, सही खुराक और सही समय बेहद महत्वपूर्ण है। उपचार में देरी मरीज की स्थिति को तेजी से गंभीर बना सकती है।

सेप्सिस के संकेतों को पहचानना जरूरी

विशेषज्ञों ने बताया कि बुखार या शरीर का तापमान असामान्य होना, तेज हृदय गति, तेजी से सांस लेना, सांस लेने में कठिनाई, भ्रम या मानसिक स्थिति में बदलाव और निम्न रक्तचाप जैसे लक्षण सेप्सिस के संकेत हो सकते हैं।

संक्रमण के साथ ऐसे लक्षण दिखाई देने पर मरीज को तत्काल चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराना जरूरी है। समय पर पहचान, संक्रमण के स्रोत का नियंत्रण और उचित उपचार से गंभीर परिणामों को कम किया जा सकता है।

बढ़ता ड्रग रेजिस्टेंस बना बड़ी चुनौती

कॉन्फ्रेंस में विशेषज्ञों ने बढ़ते एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) को सेप्सिस के उपचार के सामने बड़ी चुनौती बताया। विशेषज्ञों के मुताबिक संक्रमण पैदा करने वाले सूक्ष्मजीव लगातार बदल रहे हैं और कई दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित कर रहे हैं।

इसी कारण अस्पतालों में एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण इस्तेमाल, संक्रमण नियंत्रण और माइक्रोबायोलॉजिकल जांच को मजबूत करना बेहद आवश्यक है।

देशभर के विशेषज्ञों ने साझा किए अनुभव

दो दिवसीय कॉन्फ्रेंस में सेप्सिस की शुरुआती पहचान और डायग्नोसिस, रिससिटेशन एवं फ्लूइड मैनेजमेंट, एंटीमाइक्रोबियल थेरेपी, सेप्टिक शॉक, निमोनिया, यूरोसेप्सिस, एक्यूट किडनी इंजरी, इम्यूनोकॉम्प्रोमाइज्ड मरीजों में सेप्सिस तथा ड्रग-रेसिस्टेंट संक्रमणों के प्रबंधन जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने चर्चा की।

कार्यक्रम में RMLIMS के पूर्व निदेशक प्रो. डॉ. दीपक मालवीय, AIIMS पटना के पूर्व निदेशक डॉ. जी.के. सिंह, KGMU के डीन एकेडमिक्स प्रो. डॉ. वीरेंद्र अतम, पैरामेडिकल संकाय के डीन प्रो. के.के. सिंह सहित अनेक विशेषज्ञ मौजूद रहे।

कार्यक्रम में प्रो. डॉ. अविनाश अग्रवाल साइंटिफिक चेयरमैन, प्रो. डॉ. राजेंद्र प्रसाद ऑर्गनाइजिंग चेयरमैन और प्रो. डॉ. वेद प्रकाश ऑर्गनाइजिंग सेक्रेटरी के रूप में शामिल रहे।

KGMU में अत्याधुनिक क्रिटिकल केयर सुविधा

KGMU के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग में 26 बेड की श्वसन गहन चिकित्सा इकाई (ICU) उपलब्ध है। विभाग के अनुसार गंभीर मरीजों के उपचार में आधुनिक क्रिटिकल केयर प्रोटोकॉल और संक्रमण नियंत्रण उपायों को प्राथमिकता दी जाती है।

विश्व सेप्सिस दिवस के अवसर पर विशेषज्ञों ने स्पष्ट संदेश दिया कि सेप्सिस के खिलाफ लड़ाई में समय सबसे महत्वपूर्ण है। बीमारी की जल्द पहचान, तत्काल चिकित्सा हस्तक्षेप और एंटीबायोटिक्स का जिम्मेदारी से इस्तेमाल ही मरीजों की जान बचाने और दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों की चुनौती को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

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